भारत-इज़राइल सम्बन्ध - एक नयी यात्रा

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भारत-इज़राइल सम्बन्ध भारतीय लोकतंत्र तथा इज़राइल राज्य के मध्य द्विपक्षीय संबंधो को दर्शाता है। 14 September 1950 को भारत ने इज़राइल राष्ट्र को आधिकारिक तौर पर मान्यता प्रदान की ।  1992 तक भारत तथा इज़राइल के मध्य कुछ खास प्रकार के सम्बन्ध नहीं रहे। इसके मुख्यतः दो कारण थे- पहला, भारत गुट निरपेक्ष राष्ट्र था जो की पूर्व सोवियत संघ (अखंड रूस) का समर्थक था तथा दूसरे गुट निरपेक्ष राष्ट्रों की तरह इज़राइल को मान्यता नहीं देता था। दूसरा मुख्य कारण भारत फिलिस्तीन  की आज़ादी का समर्थक रहा। 1949 में कश्मीर में विवाद तथा सोवियत संघ के पतन तथा पाकिस्तान के गैर कानूनी घुसपैत के चलते राजनितिक परिवेश में परिवर्तन आया और भारत ने अपनी सोच बदलते हुए इज़राइल के साथ संबंधो को मजबूत करने पर जोर दिया और 1992 में नए दौर की शुरुआत हुई।

इज़राइल के साथ भारत के राजनयिक संबंध स्थापित हुए। प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने इज़राइल के साथ कूटनीतिक संबंध शुरू करने को मंजूरी दी। भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल अवधि में इज़राइल के साथ सम्बन्धों को नए आयाम तक पहुंचने की पुरजोर कोशिश की गयी। अटल बिहारी के प्रधानमंत्री रहते हुए ही इज़राइल के तत्कालीन राष्ट्रपति एरियल शेरोन ने भारत की यात्रा की थी। वह यात्रा भी किसी इज़राइल राष्ट्रपति की पहली यात्रा थी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस  की हार के बाद भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आते ही भारत और इज़राइल के मध्य सहयोग बढ़ा और दोनों राजनितिक दलों की इस्लामिक कट्टरपंथ और आतंकवाद के प्रति एक जैसे मानसिकता होने की वजह से और मध्य पूर्व में यहूदी समर्थक नीति की वजह से भारत और इज़राइल के सम्बन्ध प्रगाढ़ हुए। आज इज़राइल, रूस के बाद भारत का सबसे बड़ा सैनिक सहायक और निर्यातक है।

भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जुलाई 2017 मे इज़राइल की यात्रा कर दोनों देशो के आपस के रिश्तो को नया आयाम दिया |  नरेन्द्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री है जिन्होंने इज़राइल की यात्रा की है | इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने सारे प्रोटोकॉल को नजरअंदाज कर खुद ही भारतीय प्रधानमंत्री को लेने पंहुचे | नरेन्द्र मोदी की तीन दिवसीय यात्रा थी |